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गीता प्रेस, गोरखपुर >> सावित्री और सत्यवान

सावित्री और सत्यवान

जयदयाल गोयन्दका

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :28
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 957
आईएसबीएन :81-293-0806-1

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प्रस्तुत है सावित्री और सत्यवान की वार्तालाप.....

Savitri Aur Satyavan a hindi book by Jaidayal Goyandaka - सावित्री और सत्यवान -जयदयाल गोयन्दका

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

।।श्रीहरि:।।

नम्र निवेदन

वेदव्यास जी के लिये आया है- ‘अचतुर्वदनो ब्रह्मा द्विबाहुरपरो हरि:। अभाललोचन: शम्भु: भगवान् बादरायण:।’ अर्थात् भगवान् वेदव्यास जी चार मुखों से रहित ब्रह्मा हैं, दो भुजाओं वाले दूसरे विष्णु हैं और ललाटस्थित नेत्र से रहित शंकर हैं अर्थात् वे ब्रह्मा-विष्णु-महेशरूप है। संसार में जितनी भी कल्याणकारी, विलक्षण बातें हैं, वे सब वेदव्यासजी के ही उच्छिष्ट हैं- ‘व्यासोच्छिष्टं जगत्सर्वम्’। ऐसे वेदव्यासजी महाराज ने जीवों के कल्याण के लिये महाभारत की रचना की है। उस महाभारत का संक्षेप जीवन्मुक्त तत्त्वज्ञ भगवत्प्रेमी महापुरुष सेठजी श्रीजयदयालजी गोयन्दका ने किया है। इस प्रकार वेदव्यासजी के द्वारा मूल रूप से और सेठ जी के द्वारा संक्षिप्तरूप से लिखी हुई महाभारत में सबके लिये उपयोगी कुछ कथाओं का चयन किया गया है। इन कथाओं में एक विशेष शक्ति है, जिससे इनको पढ़ने से विशेष लाभ होता है। उनमें से सावित्री और सत्यवान् की कथा पाठकों की सेवा में प्रस्तुत है। पाठकों से विनम्र निवेदन है कि वे इस पुस्तक को स्वयं भी पढ़े और दूसरों को भी पढ़ने के लिये प्रेरित करें।

स्वामी रामसुखदास


‘‘अभ्यास ऐसा तेज करना चाहिये कि जिसमें अपने शरीर का ज्ञान भी न रहे। भगवान् के स्वयं साकार स्वरूप में आकर चेत कराने पर भी शरीर का ज्ञान न हो, जैसे श्रीसुतीक्ष्ण मुनि को भगवान् श्रीरामचन्द्र के द्वारा जगाये जाने पर भी शरीर का ज्ञान नहीं हुआ था।’’

‘‘ऐसी स्थिति शीघ्र प्राप्त करने के लिये किसी बात की भी परवाह न कर हर समय कटिबद्ध रहना चाहिये।’’

‘‘मनुष्य को समय की कीमत जाननी चाहिये, समय प्रतिक्षण घट रहा है। मनुष्य-शरीर का समय अमूल्य है। इसे भजन, ध्यान, सत्संगरूप अमूल्य कामों में ही लगाना चाहिये। जिनका समय केवल पेट पालने में ही जाता है वे तो महान् पशु हैं।’’

‘‘संसार का काम करते हुए उस काम का बुरा मालूम होना केवल वैराग्य नहीं है। इसमें हरामीपन भी है। यदि केवल वैराग्य होता तो संसार का कुछ भी काम करने के समय निरन्तर भजन-ध्यान ही हुआ करता।’’

‘‘खाना, पीना, चलना, फिरना, बोलना आदि सांसारिक कार्य तो बेगार हैं, जबरदस्ती करने पड़ते हैं, अपना निज का कार्य तो केवल एक भगवत्स्मरण ही है, जो हर समय करना चाहिये।’’

‘‘फलप्राप्ति छोड़कर मालिक के लिये जो कुछ भी कार्य किया जाता है, वह उसका भजन ही है (चाहे उसमें नाम-स्मरण न हो) इस भूलको भूल नहीं समझना चाहिये।’’
‘‘जबतक भजन-ध्यान में कठिनता प्रतीत होती है तब तक विश्वास की त्रुटि है। वास्तव में भजन-ध्यान में कोई परिश्रम नहीं है।

श्रीजयदयालजी गोयन्दका

।।श्रीहरि:।।


सावित्री-चरित्र
सावित्री का जन्म और विवाह



जयद्रथ को जीतकर उसके हाथ से द्रौपदी को छुड़ा लेने के पश्चात् धर्मराज युधिष्ठिर मुनिमण्डली के साथ बैठे थे। महर्षि लोग भी पाण्डवों पर आये हुए संकट के कारण बारम्बार शोक प्रकट कर रहे थे। उनमें से मार्कण्डेय को लक्ष्य करके युधिष्ठिर ने कहा- ‘भगवन् ! आप भूत, भविष्य और वर्तमान सब कुछ जानते हैं। देवर्षियों में भी आपका नाम विख्यात है। आपसे मैं अपने हृदय का एक सन्देह पूछता हूँ, उसका निवारण कीजिये। यह सौभाग्यशालिनी द्रुपदकुमारी यज्ञ की वेदी से प्रकट हुई है, इसे गर्भवास का कष्ट नहीं सहना पड़ा है। महात्मा पाण्डु की पुत्रवधू होने का भी गौरव इसे मिला है। इसने कभी भी पाप या निन्दित कर्म नहीं किया है। यह धर्म का तत्त्व जानती और उसका पालन करती है। ऐसी स्त्री का भी पापी जयद्रथ ने अपहरण किया। यह अपमान हमें देखना पड़ा। सगे-संबंधियों से दूर जंगल में रहकर हम तरह-तरह के कष्ट भोग रहे हैं। अत: पूछते हैं- आपने हमारे समान मन्दभाग्य पुरुष इस जगत् में कोई और भी देखा या सुना है ?’

मार्कण्डेयजी बोले- राजन् ! श्रीरामचन्द्र जी को भी वनवास और स्त्री वियोग का महान् कष्ट भोगना पड़ा है। राक्षसराज दुरात्मा रावण मायाजाल बिछाकर आश्रम पर से श्रीरामचन्द्र जी की पत्नी सीता को हर ले गया था। जटायु ने उसके कार्य में विग्न खड़ा किया तो उसने उसको मार डाला। फिर श्रीरामचन्द्र जी सुग्रीव की सहायता से समुद्रपर पुल बाँधकर लंका में गये और अपने तीखे बाणों से लंका को भस्मकर सीता को वापस लाये।

महाबाहु युधिष्ठिर ! इस प्रकार पूर्वकाल में अतुलित पराक्रमी श्रीरामचन्द्र जी वनवास के कारण बड़ा भयंकर कष्ट भोग चुके हैं। पुरुषसिंह ! तुम क्षत्रिय हो, शोक मत करो; तुम अपने भुजबल के भरोसे प्रत्यक्ष फल दोनेवाले मार्गपर चल रहे हो। तुम्हारा इसमें अणुमात्र भी अपराध नहीं है। रामचन्द्र जी तो अकेले ही भयंकर पराक्रमी रावण को युद्ध में मारकर जानकीजी को ले आये थे। उनके सहायक तो केवल वानर और रीछे ही थे। इन सब बातों पर तुम विचार करो। इस प्रकार मतिमान् मार्कण्डेयजी ने राजा युधिष्ठिर को धैर्य बँधाया।

युधिष्ठिर ने पूछा- मुनिवर ! इस द्रौपदी के लिये मुझे जैसा शोक होता है, वैसा न तो अपने लिये होता है न इन भाइयों के लिये और न राज्य छिन जाने के लिये ही। यह जैसी पतिव्रता है, वैसी क्या कोई दूसरी भाग्यवती नारी भी आपने पहले कभी देखी या सुनी है ?
मार्कण्डेय जी ने कहा- राजन् ! राजकन्या सावित्री ने जिस प्रकार यह कुलकामिनियों का परम सौभाग्य रूप पातिव्रत्य का सुयश प्राप्त किया था, वह मैं कहता हूँ; सुनो। मद्रदेश में अश्वपति नाम का एक बड़ा ही धार्मिक और ब्राह्मणसेवी राजा था। वह अत्यन्त उदारहृदय, सत्यनिष्ठ, जितेन्द्रिय, दानी, चतुर, पुरवासी और देशवासियों का प्रिय, समस्त प्राणियों के हित में तत्पर रहनेवाला और क्षमाशील था। उस नियमनिष्ठ राजा की धर्मशीला ज्येष्ठा पत्नी को गर्भ रहा और यथासमय उसके एक कमलनयनी कन्या उत्पन्न हुई। राजा ने प्रसन्न होकर उस कन्या के जातकर्मादि सब संस्कार किये। वह कन्या सावित्री के मन्त्रद्वारा हवन करने पर सावित्री देवी ने ही प्रसन्न होकर दी थी; इसलिये ब्राह्मणों ने और राजा ने उसका नाम ‘सावित्री’ रखा।

मूर्तिमती लक्ष्मी के समान वह कन्या धीरे-धीरे बढ़ने लगी। यथासमय उसने युवावस्था में प्रवेश किया। कन्या को युवती हुई देखकर महाराज अश्वपति बड़े चिन्तित हुए। कोई वर मिलता न देखकर उन्होंने सावित्री से कहा, ‘बेटी ! अब तू विवाह के योग्य हो गयी है और अभी तक तेरे लिये कोई वर नहीं मिल सका है, इसलिए तू स्वयं ही अपने योग्य कोई वर खोज ले। धर्मशास्त्र की ऐसी आज्ञा है कि विवाह के योग्य हो जाने पर जो कन्यादान नहीं करता, वह पिता निन्दनीय है; ऋतुकाल में जो स्त्रीसमागम नहीं करता, वह पति निन्दा का पात्र है और पति के मर जाने पर उस विधवा माता का जो पालन नहीं करता, वह पुत्र निन्दनीय है।* अत: शीघ्र ही वर की खोज कर ले और ऐसा कर, जिससे मैं देवताओं की दृष्टि में अपराधी न बनूँ।’ पुत्री से ऐसा कहकर उन्होंने अपने बूढ़े मन्त्रियों को आज्ञा दी कि ‘आपलोग सवारी लेकर सावित्री के साथ जायँ।’
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*अप्रदाता पिता वाच्यो वाच्यश्चनुपयन् पति:।
मृते भर्तरि पुत्रश्च वाच्यो मातुररक्षिता।।

(महा. वन. 293/35)


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